Monday, April 25, 2022

एक पल रुको

खरखराती हुई चुभन और बहता हुआ गर्म लहू,
डरावना नही होता है बहते लहू की महक,
ना ही धीरे धीरे पीला पड़ता अस्तित्व ,
डरावना होता है अपनो की आंखों में डर,
और आंखों के सामने गुजरती जिंदगी की यादें ।।

आत्महत्या कोई रास्ता नहीं है, रुकिए और बात करिए अपने परिवार से, उनसे जिनको फर्क पड़ेगा आपके न होने से और भरोसा रखिए कोई ना कोई सूरत निकल ही आएगी जिंदगी में रोशनी देखने की ।।

आप यहां है, क्योंकि आपकी जरूरत है ।।

#suicideprevention
#suicide

Saturday, February 26, 2022

The war of Cowards

Non combatants and innocent citizens are the ones who suffer the most in any war but their consent is not taken before any mad decision. It is their world too as much as it is of anyone else's (including the mindless violent ones who see war as nothing but another fps video game).

I have never understood why political leaders can't sort it among themselves instead of making the very people suffer whom they were supposed to protect.

However, I'm very sure that the very people who caused this war would wet their pants if they were to fight it with guns, masks, dodging bullets.

Let's hope the mindless, shameless war mongers get the message that there is no glory  in death and destruction.


#shamelesspoliticians
#warisacrime
#ukraineinvasion 

Friday, January 28, 2022

The corporate fox

They can't code.
They can't architect.
They can't sell.
They aren't the customer.

Yet, they act as if they are the one who owns the product, the company and the account just because they interface with the customer.

"The customer wants ..." is lashed along with every unreasonable request while product teams wonder who hired this specimen.

One of the evils of working on the development side is having to own everything from POC to release while everyone else types "ASAP" on their keyboards. Specially the ones who do the least.

If you are one of those who are invoking the 'customer' on every request, then you need to understand that you get paid to interface with the customer, manage the stress without contributing any.

On the other hand, If you are among the doers and makers, then know that you are not alone and you can pass this post to the specimen in question as an eye opener.

:)

 #bullyingawareness 
 #development

Friday, October 15, 2021

रावण का मन

विशाल भुजा, विपरीत बुद्धि, शीश दश का दंभ लिए,
फिर डोल उठा दशानन का उर सीता के प्रति राग लिए ।

लहू लोच लोचन, कुटिल स्वर, मन अंतर  तम का अंश लिए,
विध्वंश का बीज लिए मन में आतुर मन भीतर पंक लिए। 

स्नेहिल मन पुष्पित किए, सीता निकली संकल्प लिए,
हर लूं व्यथा, संभव यथा द्विज तिष्ठित कुटी पे प्रश्न लिए ।

हरा जो शील, धरा नभ नील, रुके पीड़ा का भाव लिए,
दहित दशानन सहित कुल सब आज भी अपमान लिए ।

 सुबोध, दशहरा  2021

ये कविता रावण और सीता के मन को परिलक्षित करती है, एक तरफ रावण मन में कपट लिए आगे आता है और दूसरी तरफ सीता सरल हृदय से द्वार पे खड़े एक विप्र के लिए किसी भी तरह कुछ संभव सहायता करने की मनोदशा में है ।

सरल हृदय सीता के साथ हुआ दुर्व्यवहार समूचे विश्व को आकाश पाताल को स्तब्ध कर देता है, फलस्वरूप इतने सदियों बाद भी रावण दाह पा रहा है और सीता पूजी जा रही हैं ।

Sunday, April 26, 2020

मां

आशा और निराशा के बीच खड़ी
एक छाव सी तुम,
अपने पल्लू से निराशा की तपन को रोके, मेरे सिहरते हुए एहसासों को अपनी गोद में समेटे, 
मेरे घर आने के पलों को समेटने आंगन में खड़ी तुम, 
और एक शब्द में तुम्हे ढूंढता मेरा अस्तित्व, पर तुम मां हो या मां शब्द तुमसे बना है ?  --- सुबोध

प्रेम कृष्ण की दृष्टि से


निसर्ग अधरों पे मेरे,
निसर्ग स्वर का परिवर्तन,
आमंत्रण है तुम्हे प्रिए,
नित प्रेम प्रकाश करूं अर्पण।

कहीं कूक पपिहा दे रहा,
विरह का अपनी अभिवेदन,
मुझ निश्चल की सांसे अविरत,
मांगे तुमसे अविरल जीवन।

श्याम घटा के विलयों में,
केशों का तुम्हारे परिचित्रण,
नभ की नीरव खामोशी सा,
तुम्हारे स्पर्श का स्पंदन ।

विस्तृत तुरंग तरंग सदा,
तुमसे पुलकित सारा जीवन,
इस लोक में तुमसे प्रेम बनें,
अतुलित महिमा का दिग्दर्शन ।

             सुबोध

यादें

यादें रह जाती हैं एक हरी पत्ती की तरह,
हवाओं से लड़ती सूखी टहनी से चिपकी,
बोलते हुए सन्नाटे से नोक झोंक करती,
इस उम्मीद में कि ये दरख़्त फिर हरा हो ।


Wednesday, May 15, 2019

क्यों सांस है सीने में

क्यों सांस है सीने में
आवाज़ बोहोत पर सुर खाली
क्यों सांस है सीने में ।

सालों के उजले सपने
सपनें अपनें पर मैं खाली
क्यों सांस है सीने में।

हास उपहास और भागदौड़
संजोग बहोत पर घर खाली
क्यों सांस है सीने में ।

कृति - सुबोध

विरह - The sting of love

विरह

हर पल तुमको पाना और खोना तुमको खुद से,
नैनों में तुम्हे बसाना और नैनों से नींदें खोना,
रात दिन तुम्हें निहारना, सराहना, याद करना,
तुम्हारी बातों पे हसना और कभी आंसू बहाना।

दिन का रात में बदलना और रात का दिन में,
इन दोनों का अस्तित्व तुम्हारे प्रेम में खोना,
तुम्हारे साथ के दिवास्वप्न प्रतिपल संजोना,
और भूल जाना दिवास्वप्नों का भंगुर होना।

अपने मैं को खोना और खोना खुद का होना,
रोकना क़दमों को और फिर रुक के चलना,
राह के कंटकों से नित पुष्प हार पिरोना,
धारण कर इन हारों को इठलाना, मुस्कुराना।

काल के ग्रास पे कभी, ये आज भी चढ़ जाएगा,
मेरा होना, मेरा साया बस धूल सा रह जाएगा,
बचेगी बस मेरी लगन, मेरी छुधा चारों तरफ,
विरह में जल के कहीं कोई प्रभु सा हो जाएगा ।

सुबोध
Sep 2014

सन्नाटे

ऐसे सन्नाटे रोज कुछ बोल के जाते हैं
तेरे होने के एहसासों को भिगो के जाते हैं।
क्यों तन्हाई का सिरा है जिंदगी का दौर
जब दिन और रात तेरे नाम से आते हैं ।।

ऐसे सन्नाटे रोज कुछ बोल के जाते हैं
 पास तेरे तेरा कोई अपना कहने को है
मेरे खाली कमरे के किनारे पड़े कपड़े
वापस मेरे आने की बस आस लगाते हैं

ऐसे सन्नाटे रोज कुछ बोल के जाते हैं
हर पहर यादों के दौर एक फेर लगाते हैं ।।
सर्द रात में रुकी दिल की धड़कन से
 पैगाम तेरे कई शामों बाद आते हैं ।।
सुबोध

Friday, December 14, 2018

हिन्दू , हिंदुत्व और राष्ट्र - कुछ जलते प्रश्न ।


दिन 12 जून 1975,


इलाहाबाद हाई कोर्ट इंदिरा गांधी के चुनाव को चुनाव के दौरान हुई धांधलियों के कारण अवैध घोषित कर देती है,श्रीमती गांधी अपने पद से इस्तीफा देने की जगह देश में इमरजेंसी लगा कर सारे विपक्ष और विरोधी दलों के दमन में जुट जाती हैं।

इसी भयानक समय में इंदिरा संविधान की भूमिका में सेक्युलर यानी धर्मनिरपेक्ष शब्द डाल देती है, ताकि देश के विभाजन के बाद से उहापोह की इस्थिति में रह रहे मुस्लिम समाज को हिन्दू राष्ट्र के संभावित भय से मुक्ति दिला के भविष्य में चुनावी जीत पक्की की जा सके ।




भारत के विभाजन से थोड़ा पहले के इतिहास को खंगालने पे एक ध्यान देने की बात मिलती है कि 1947 जून में ब्रिटिश संसद द्वारा पारित कानून "इंडिपेंडेंस ऑफ इंडिया एक्ट" जिसकी कानूनी वैद्यता के अंतर्गत ही हिंदुओं के लिए हिंदुस्तान और मुसलमानों के लिए पाकिस्तान , इन दो देशों को बनाने की पहल हुई थी , वो कानून भी भारत को हिंदुओं की स्वतंत्र शाशन की मंशा के रूप में परिभाषित करता है ।

यानी कि हिंदुओं का स्वतंत्र राष्ट्र  (* आधार - इंडिपेंडेंस ऑफ इंडिया एक्ट की प्रति),  साथ ही ये भी बात गौर करने योग्य है कि डॉ अम्बेडकर की अध्यक्षता वाली संविधान पीठ ने संविधान निर्माण के दौरान दो बार संविधान में "सेक्युलर" शब्द डालने के प्रयास को सिरे से खारिज कर दिया था ।

स्वयं डॉ अंबेडकर का कहना था कि राष्ट्र का स्वरूप क्या हो , वो सेक्युलर हो या सोशलिस्ट ये तो जनता निर्धारित करेगी न कि संविधान । लेकिन परिवारवाद की कृपा से राजनीति में आई इंदिरा नें, ना सिर्फ देश को इमरजेंसी के चाबुक से घायल किया बल्कि सम्पूर्ण संविधान सभा और उसमें शामिल सभी सदस्यों के निर्णय को दरकिनार करते हुए निहित स्वार्थों की सिद्धि हेतु कानूनी रूप से निर्मित (हिन्दू) राष्ट्र को दुबारा से 1946 वाली स्तिथियों में झोंक दिया ।

जब जिन्ना ने ये कहते हुए मुस्लिम राष्ट्र की मांग की थी कि हिंदुओं के बीच में मुसलमानों का अस्तित्व और उनकी संस्कृति खत्म हो जाएगी, अतः द्वि राष्ट्र सिद्धान्त की मांग को हवा दी, मुसलमानो के लिए पाकिस्तान और बाकी बचा हिंदुओं का हिंदुस्तान (इस समय तक सिख, जैन, बौद्ध इत्यादि भारतीय मूल के धर्म और परंपराएं हिन्दू परम्पराओं में समाहित ही मानी जाती थीं) ।

आज 1946 के बाद मुस्लिम समाज एक सम्पूर्ण मुस्लिम राष्ट्र की मांग करके उसे पाने के बाद भी भारत में एक बार फिर AIMIM जैसे संगठनों के बैनर तले इकट्ठा हो रहा है, जिसका एक मात्र मकसद मुसलमानों का विकास और सिर्फ मुसलमानो के इत्तिहाद के लिए काम करना है, वहीं दूसरी ओर आज भी हिन्दू सदियों पहले तोड़ दिए गए राम मंदिर को बना पाने की भीख मांगते नज़र आते हैं उस देश में जो कानूनन हिन्दू राष्ट्र बनना था ।

अब आते हैं कुछ कड़वे प्रश्नों पे -

क्या हमको ये प्रश्न नही पूछने चाहिए कि एक ऐसे राजनीतिज्ञ को, जिसके चुनाव को स्वयं हाई कोर्ट ने अवैद्य करार दिया हो, क्या अधिकार था कि 80 करोड़ की जनता के भविष्य और पूरे राष्ट्र के चरित्र के साथ खिलवाड़ कर बैठे ?

 क्या हमको ये प्रश्न नही पूछने चाहिए कि उसके बाद आई सरकारों की ये जिम्मेदारी नही थी कि ऐसे असंवैधानिक कार्यों को निरस्त कर दें ?

 आखरी प्रश्न क्या भारत की जनता सेक्युलर शब्द का मतलब भी जानती थी जब विदेश में पढ़ी इंदिरा ने सेक्युलर शब्द से हमारे अधिकार रातों रात हर लिए ? जिस देश में सुबह राम राम से और शाम हरि बोल से हो, और तो और राकेट भी छोड़ने के पहले हम नारियल फोड़ते हैं, तो हम धर्म विहीन, धर्म निर्पेक्ष कैसे और क्यों हो गए ?

 मैं पूरे यकीन से कह सकता हूँ कि जनता नें तो ये कभी न चाहा था, तो ये कैसा लोक तंत्र है और ये कैसे नेता हैं जो जनता के द्वारा चुने जाने पर भी जन मन की न करके कुछ और ही करते आएं हैं ?

याद रखने की बात है कि सेक्युलर शब्द न सिर्फ हिन्दू समाज के अधिकारों का हनन है, बल्कि ये घटना जनतंत्र के मुख पे एक कालिख की तरह है कि एक अयोग्य करार दी जा चुकी नेता सम्पूर्ण राष्ट्र को अपनी बपौती की तरह इस्तेमाल करे और राष्ट्र के चरित्र को अपनी मर्जी से परिभाषित कर दे ।

 क्या किसी राजनीतिक पार्टी में ये इच्छा शक्ति नहीं है की भारत की मौलिक संस्कृति को भारत के संविधान की गरिमा बना पाए ? क्या हमारा इतिहास, हमारी संस्कृति अपनी पहचान की भीख मांगने को मजबूर रहेगी ?

 इन सवालों के जवाब आज नही होंगे तो कल हिन्दू समाज और हिन्दू संस्कृति भी नही होगी, जाती और वर्ण की तो कोई पूछ ही नही । _/|\_

Thursday, June 10, 2010

men are from mars and women are from Venus ? Really ?

-Incomplete article ,being written ideas are all scattered .


So many books and so many psychologists all talking about the basic difference between men and the women,about why their logics differ so much from each other.Some tried to explain by way of attitude but none could define the reason to exact reason.

Etymological explanations won't yield as the difference has been older than the language, etymology is meek when it comes to defining difference but its very good in defining the facts in translatable terms.

In order to understand the difference and its implications one has to fully understand the purpose of why's of the them.

The major purpose in their structure (physically) is mainly adoption for the best possible route to attain and complete reproduction in their own way.
The man travels far and wide to spread his seeds, fights to control the food, women and hence not only rules while in his life time but also when he is not there.

A woman on the other hand, makes sure that she is around a strong male and hence also makes sure that when she is completing her part of reproductive cycle she is protected well along with the offspring.

He goes out and around to live the reproductive cycle and she makes sure that whenever her egg is fertilized she bears it properly and hence the selection of secure male, either money wise or physically, as and how the definition of security is fulfilled.

Possessiveness - avoiding insecurity.
Polygamy - Promoting chances of reproduction the ultimate physical purpose in every living being.
Territorial approach - maintain stability in life style, keep threat at bay for both family and self.